रविवार, 17 मई 2015

रामरक्षा स्तोत्र अर्थ सहित

श्रीरामरक्षा स्तोत्र अर्थ सहित ॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम्‌ ॥ श्रीगणेशायनम: । अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य । बुधकौशिक ऋषि: । श्रीसीतारामचंद्रोदेवता । अनुष्टुप्‌ छन्द: । सीता शक्ति: । श्रीमद्‌हनुमान्‌ कीलकम्‌ । श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥ अर्थ: — इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्रके रचयिता बुधकौशिक ऋषि हैं, सीता और रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, सीता शक्ति हैं, हनुमानजी कीलक है तथा श्रीरामचंद्रजीकी प्रसन्नताके लिए राम रक्षा स्तोत्रके जपमें विनियोग किया जाता हैं | ॥ अथ ध्यानम्‌ ॥ ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं । पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌ ॥ वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं । नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥ ध्यान धरिए — जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं,बद्ध पद्मासनकी मुद्रामें विराजमान हैं और पीतांबर पहने हुए हैं, जिनके आलोकित नेत्र नए कमल दलके समान स्पर्धा करते हैं, जो बायें ओर स्थित सीताजीके मुख कमलसे मिले हुए हैं- उन आजानु बाहु, मेघश्याम,विभिन्न अलंकारोंसे विभूषित तथा जटाधारी श्रीरामका ध्यान करें | ॥ इति ध्यानम्‌ ॥ चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥१॥ श्री रघुनाथजीका चरित्र सौ कोटि विस्तारवाला हैं | उसका एक-एक अक्षर महापातकोंको नष्ट करनेवाला है | ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ । जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥ नीले कमलके श्याम वर्णवाले, कमलनेत्रवाले , जटाओंके मुकुटसे सुशोभित, जानकी तथा लक्ष्मण सहित ऐसे भगवान् श्रीरामका स्मरण कर, सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्‌ । स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥ जो अजन्मा एवं सर्वव्यापक, हाथोंमें खड्ग, तुणीर, धनुष-बाण धारण किए राक्षसोंके संहार तथा अपनी लीलाओंसे जगत रक्षा हेतु अवतीर्ण श्रीरामका स्मरण कर, रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ । शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥ मैं सर्वकामप्रद और पापोंको नष्ट करनेवाले राम रक्षा स्तोत्रका पाठ करता हूं | राघव मेरे सिरकी और दशरथके पुत्र मेरे ललाटकी रक्षा करें | कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती । घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥ कौशल्या नंदन मेरे नेत्रोंकी, विश्वामित्रके प्रिय मेरे कानोंकी, यज्ञरक्षक मेरे घ्राणकी और सुमित्राके वत्सल मेरे मुखकी रक्षा करें | जिव्हां विद्यानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: । स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥ विद्यानिधि मेरी जिह्वाकी  रक्षा करें, कंठकी भरत-वंदित, कंधोंकी दिव्यायुध और भुजाओंकी महादेवजीका धनुष तोडनेवाले भगवान् श्रीराम रक्षा करें | करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ । मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥ मेरे हाथोंकी सीता पति श्रीराम रक्षा करें, हृदयकी जमदग्नि ऋषिके पुत्रको (परशुराम)  जीतनेवाले, मध्य भागकी खरके (नामक राक्षस)  वधकर्ता और नाभिकी जांबवानके आश्रयदाता रक्षा करें | सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: । ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌ ॥८॥ मेरे कमरकी सुग्रीवके स्वामी, हडियोंकी हनुमानके प्रभु और रानोंकी राक्षस कुलका विनाश करनेवाले रघुकुलश्रेष्ठ रक्षा करें | जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: । पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥ मेरे जानुओंकी सेतुकृत, जंघाओकी दशानन वधकर्ता, चरणोंकी विभीषणको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले और सम्पूर्ण शरीरकी श्रीराम रक्षा करें | एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌ । स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥१०॥ शुभ कार्य करनेवाला जो भक्त भक्ति एवं श्रद्धाके साथ रामबलसे संयुक्त होकर इस स्तोत्रका पाठ करता हैं, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील हो जाता हैं | पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: । न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥ जो जीव पाताल, पृथ्वी और आकाशमें विचरते रहते हैं अथवा छद्दम वेशमें घूमते रहते हैं , वे राम नामोंसे सुरक्षित मनुष्यको देख भी नहीं पाते | रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌ । नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥ राम, रामभद्र तथा रामचंद्र आदि नामोंका स्मरण करनेवाला रामभक्त पापों से लिप्त नहीं होता, इतना ही नहीं, वह अवश्य ही भोग और मोक्ष दोनोंको प्राप्त करता है | जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ । य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥ जो संसारपर विजय करनेवाले मंत्र राम-नाम से सुरक्षित इस स्तोत्र को कंठस्थ कर लेता हैं, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं | वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ । अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥१४॥ जो मनुष्य वज्रपंजर नामक इस राम कवचका स्मरण करता हैं, उसकी आज्ञाका कहीं भी उल्लंघन नहीं होता तथा उसे सदैव विजय और मंगलकी ही प्राप्ति होती हैं | आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: । तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥ भगवान् शंकरने स्वप्नमें इस रामरक्षा स्तोत्रका आदेश बुध कौशिक ऋषिको दिया था, उन्होंने प्रातः काल जागनेपर उसे वैसा ही लिख दिया | आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌ । अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु: ॥१६॥ जो कल्प वृक्षोंके बागके समान विश्राम देने वाले हैं, जो समस्त विपत्तियोंको दूर करनेवाले हैं  और जो तीनो लोकों में सुंदर हैं, वही श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं | तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ । पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥ जो युवा,सुन्दर, सुकुमार,महाबली और कमलके (पुण्डरीक)  समान विशाल नेत्रों वाले हैं, मुनियोंकी समान वस्त्र एवं काले मृगका चर्म धारण करते हैं | फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ । पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥ जो फल और कंदका आहार ग्रहण करते हैं, जो संयमी , तपस्वी एवं ब्रह्रमचारी हैं , वे दशरथके पुत्र राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें | शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ । रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥ ऐसे महाबली – रघुश्रेष्ठ मर्यादा पुरूषोतम समस्त प्राणियोंके शरणदाता, सभी धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ और राक्षसोंके कुलोंका समूल नाश करनेमें समर्थ हमारा रक्षण करें | आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ । रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥२०॥ संघान किए धनुष धारण किए, बाणका स्पर्श कर रहे, अक्षय बाणोसे युक्त तुणीर लिए हुए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करनेके लिए मेरे आगे चलें | संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा । गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥ हमेशा तत्पर, कवचधारी, हाथमें खडग, धनुष-बाण तथा युवावस्थावाले भगवान् राम लक्ष्मण सहित आगे-आगे चलकर हमारी रक्षा करें | रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली । काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥ भगवानका कथन है कि श्रीराम, दाशरथी, शूर, लक्ष्मनाचुर, बली, काकुत्स्थ , पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुतम, वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: । जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥ वेदान्त्वेघ, यज्ञेश,पुराण पुरूषोतम , जानकी वल्लभ, श्रीमान और अप्रमेय पराक्रम आदि नामोंका इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: । अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥ नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक जप करनेवालेको निश्चित रूपसे अश्वमेध यज्ञसे भी अधिक फल प्राप्त होता हैं | रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ । स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥ दूर्वादलके समान श्याम वर्ण, कमल-नयन एवं पीतांबरधारी श्रीरामकी उपरोक्त दिव्य नामोंसे स्तुति करनेवाला संसारचक्रमें नहीं पड़ता | रामं लक्शमण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ । काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌ राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌ । वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥२६॥ लक्ष्मण जीके पूर्वज , सीताजीके पति, काकुत्स्थ, कुल-नंदन, करुणाके सागर , गुण-निधान , विप्र भक्त, परम धार्मिक , राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथके पुत्र, श्याम और शांत मूर्ति, सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर, रघुकुल तिलक , राघव एवं रावणके शत्रु भगवान् रामकी मैं वंदना करता हूं | रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥ राम, रामभद्र, रामचंद्र, विधात स्वरूप , रघुनाथ, प्रभु एवं सीताजीके स्वामीकी मैं वंदना करता हूं | श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम । श्रीराम राम भरताग्रज राम राम । श्रीराम राम रणकर्कश राम राम । श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥ हे रघुनन्दन श्रीराम ! हे भरतके अग्रज भगवान् राम! हे रणधीर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ! आप मुझे शरण दीजिए | श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥ मैं एकाग्र मनसे श्रीरामचंद्रजीके चरणोंका स्मरण और वाणीसे गुणगान करता हूं, वाणी द्धारा और पूरी श्रद्धाके साथ भगवान् रामचन्द्रके चरणोंको प्रणाम करता हुआ मैं उनके चरणोंकी शरण लेता हूँ | माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: । स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: । सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु । नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥ श्रीराम मेरे माता, मेरे पिता , मेरे स्वामी और मेरे सखा हैं | इस प्रकार दयालु श्रीराम मेरे सर्वस्व हैं, उनके सिवामें किसी दुसरेको नहीं जानता | दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा । पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥ जिनके दाईं और लक्ष्मणजी, बाईं और जानकीजी और सामने हनुमान ही विराजमान हैं, मैं उन्ही रघुनाथजीकी वंदना करता हूं | लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ । कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥ मैं सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर तथा रणक्रीडामें धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणाकी मूर्ति और करुणाके भण्डार रुपी श्रीरामकी शरण में हूँ | मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥ जिनकी गति मनके समान और वेग वायुके समान (अत्यंत तेज) है, जो परम जितेन्द्रिय एवं बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं, मैं उन पवन-नंदन वानारग्रगण्य श्रीराम दूतकी शरण लेता हूं | कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ । आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥ मैं कवितामयी डालीपर बैठकर, मधुर अक्षरोंवाले ‘राम-राम’ के मधुर नामको कूजते हुए वाल्मीकि रुपी कोयलकी वंदना करता हूं | आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्‌ । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥३५॥ मैं इस संसारके प्रिय एवं सुन्दर , उन भगवान् रामको बार-बार नमन करता हूं, जो सभी आपदाओंको दूर करनेवाले तथा सुख-सम्पति प्रदान करनेवाले हैं | भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्‌ । तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥ ‘राम-राम’ का जप करनेसे मनुष्यके सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं | वह समस्त सुख-सम्पति तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता हैं | राम-रामकी गर्जनासे यमदूत सदा भयभीत रहते हैं | रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे । रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: । रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम्‌ । रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥ राजाओंमें श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजयको प्राप्त करते हैं | मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामका भजन करता हूं | सम्पूर्ण राक्षस सेनाका नाश करनेवाले श्रीरामको मैं नमस्कार करता हूं | श्रीरामके समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं | मैं उन शरणागत वत्सलका दास हूँ | मैं सद्सिव श्रीराममें ही लीन रहूं | हे श्रीराम! आप मेरा (इस संसार सागर से) उद्धार करें | राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥ (शिव पार्वती से बोले –) हे सुमुखी ! राम- नाम ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ के समान हैं | मैं सदा रामका स्तवन करता हूं और राम-नाममें ही रमण करता हूं | इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥ इस प्रकार बुधकौशिकद्वारा रचित श्रीराम रक्षा स्तोत्र सम्पूर्ण होता है | ॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥



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रामरक्षा स्तोत्र अर्थ सहित

श्रीरामरक्षा स्तोत्र अर्थ सहित ॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम्‌ ॥ श्रीगणेशायनम: । अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य । बुधकौशिक ऋषि: । श्रीसीतारामचंद्रोदेवता । अनुष्टुप्‌ छन्द: । सीता शक्ति: । श्रीमद्‌हनुमान्‌ कीलकम्‌ । श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥ अर्थ: — इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्रके रचयिता बुधकौशिक ऋषि हैं, सीता और रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, सीता शक्ति हैं, हनुमानजी कीलक है तथा श्रीरामचंद्रजीकी प्रसन्नताके लिए राम रक्षा स्तोत्रके जपमें विनियोग किया जाता हैं | ॥ अथ ध्यानम्‌ ॥ ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं । पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌ ॥ वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं । नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥ ध्यान धरिए — जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं,बद्ध पद्मासनकी मुद्रामें विराजमान हैं और पीतांबर पहने हुए हैं, जिनके आलोकित नेत्र नए कमल दलके समान स्पर्धा करते हैं, जो बायें ओर स्थित सीताजीके मुख कमलसे मिले हुए हैं- उन आजानु बाहु, मेघश्याम,विभिन्न अलंकारोंसे विभूषित तथा जटाधारी श्रीरामका ध्यान करें | ॥ इति ध्यानम्‌ ॥ चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥१॥ श्री रघुनाथजीका चरित्र सौ कोटि विस्तारवाला हैं | उसका एक-एक अक्षर महापातकोंको नष्ट करनेवाला है | ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ । जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥ नीले कमलके श्याम वर्णवाले, कमलनेत्रवाले , जटाओंके मुकुटसे सुशोभित, जानकी तथा लक्ष्मण सहित ऐसे भगवान् श्रीरामका स्मरण कर, सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्‌ । स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥ जो अजन्मा एवं सर्वव्यापक, हाथोंमें खड्ग, तुणीर, धनुष-बाण धारण किए राक्षसोंके संहार तथा अपनी लीलाओंसे जगत रक्षा हेतु अवतीर्ण श्रीरामका स्मरण कर, रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ । शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥ मैं सर्वकामप्रद और पापोंको नष्ट करनेवाले राम रक्षा स्तोत्रका पाठ करता हूं | राघव मेरे सिरकी और दशरथके पुत्र मेरे ललाटकी रक्षा करें | कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती । घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥ कौशल्या नंदन मेरे नेत्रोंकी, विश्वामित्रके प्रिय मेरे कानोंकी, यज्ञरक्षक मेरे घ्राणकी और सुमित्राके वत्सल मेरे मुखकी रक्षा करें | जिव्हां विद्यानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: । स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥ विद्यानिधि मेरी जिह्वाकी  रक्षा करें, कंठकी भरत-वंदित, कंधोंकी दिव्यायुध और भुजाओंकी महादेवजीका धनुष तोडनेवाले भगवान् श्रीराम रक्षा करें | करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ । मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥ मेरे हाथोंकी सीता पति श्रीराम रक्षा करें, हृदयकी जमदग्नि ऋषिके पुत्रको (परशुराम)  जीतनेवाले, मध्य भागकी खरके (नामक राक्षस)  वधकर्ता और नाभिकी जांबवानके आश्रयदाता रक्षा करें | सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: । ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌ ॥८॥ मेरे कमरकी सुग्रीवके स्वामी, हडियोंकी हनुमानके प्रभु और रानोंकी राक्षस कुलका विनाश करनेवाले रघुकुलश्रेष्ठ रक्षा करें | जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: । पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥ मेरे जानुओंकी सेतुकृत, जंघाओकी दशानन वधकर्ता, चरणोंकी विभीषणको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले और सम्पूर्ण शरीरकी श्रीराम रक्षा करें | एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌ । स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥१०॥ शुभ कार्य करनेवाला जो भक्त भक्ति एवं श्रद्धाके साथ रामबलसे संयुक्त होकर इस स्तोत्रका पाठ करता हैं, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील हो जाता हैं | पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: । न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥ जो जीव पाताल, पृथ्वी और आकाशमें विचरते रहते हैं अथवा छद्दम वेशमें घूमते रहते हैं , वे राम नामोंसे सुरक्षित मनुष्यको देख भी नहीं पाते | रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌ । नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥ राम, रामभद्र तथा रामचंद्र आदि नामोंका स्मरण करनेवाला रामभक्त पापों से लिप्त नहीं होता, इतना ही नहीं, वह अवश्य ही भोग और मोक्ष दोनोंको प्राप्त करता है | जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ । य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥ जो संसारपर विजय करनेवाले मंत्र राम-नाम से सुरक्षित इस स्तोत्र को कंठस्थ कर लेता हैं, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं | वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ । अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥१४॥ जो मनुष्य वज्रपंजर नामक इस राम कवचका स्मरण करता हैं, उसकी आज्ञाका कहीं भी उल्लंघन नहीं होता तथा उसे सदैव विजय और मंगलकी ही प्राप्ति होती हैं | आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: । तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥ भगवान् शंकरने स्वप्नमें इस रामरक्षा स्तोत्रका आदेश बुध कौशिक ऋषिको दिया था, उन्होंने प्रातः काल जागनेपर उसे वैसा ही लिख दिया | आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌ । अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु: ॥१६॥ जो कल्प वृक्षोंके बागके समान विश्राम देने वाले हैं, जो समस्त विपत्तियोंको दूर करनेवाले हैं  और जो तीनो लोकों में सुंदर हैं, वही श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं | तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ । पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥ जो युवा,सुन्दर, सुकुमार,महाबली और कमलके (पुण्डरीक)  समान विशाल नेत्रों वाले हैं, मुनियोंकी समान वस्त्र एवं काले मृगका चर्म धारण करते हैं | फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ । पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥ जो फल और कंदका आहार ग्रहण करते हैं, जो संयमी , तपस्वी एवं ब्रह्रमचारी हैं , वे दशरथके पुत्र राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें | शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ । रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥ ऐसे महाबली – रघुश्रेष्ठ मर्यादा पुरूषोतम समस्त प्राणियोंके शरणदाता, सभी धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ और राक्षसोंके कुलोंका समूल नाश करनेमें समर्थ हमारा रक्षण करें | आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ । रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥२०॥ संघान किए धनुष धारण किए, बाणका स्पर्श कर रहे, अक्षय बाणोसे युक्त तुणीर लिए हुए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करनेके लिए मेरे आगे चलें | संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा । गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥ हमेशा तत्पर, कवचधारी, हाथमें खडग, धनुष-बाण तथा युवावस्थावाले भगवान् राम लक्ष्मण सहित आगे-आगे चलकर हमारी रक्षा करें | रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली । काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥ भगवानका कथन है कि श्रीराम, दाशरथी, शूर, लक्ष्मनाचुर, बली, काकुत्स्थ , पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुतम, वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: । जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥ वेदान्त्वेघ, यज्ञेश,पुराण पुरूषोतम , जानकी वल्लभ, श्रीमान और अप्रमेय पराक्रम आदि नामोंका इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: । अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥ नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक जप करनेवालेको निश्चित रूपसे अश्वमेध यज्ञसे भी अधिक फल प्राप्त होता हैं | रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ । स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥ दूर्वादलके समान श्याम वर्ण, कमल-नयन एवं पीतांबरधारी श्रीरामकी उपरोक्त दिव्य नामोंसे स्तुति करनेवाला संसारचक्रमें नहीं पड़ता | रामं लक्शमण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ । काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌ राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌ । वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥२६॥ लक्ष्मण जीके पूर्वज , सीताजीके पति, काकुत्स्थ, कुल-नंदन, करुणाके सागर , गुण-निधान , विप्र भक्त, परम धार्मिक , राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथके पुत्र, श्याम और शांत मूर्ति, सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर, रघुकुल तिलक , राघव एवं रावणके शत्रु भगवान् रामकी मैं वंदना करता हूं | रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥ राम, रामभद्र, रामचंद्र, विधात स्वरूप , रघुनाथ, प्रभु एवं सीताजीके स्वामीकी मैं वंदना करता हूं | श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम । श्रीराम राम भरताग्रज राम राम । श्रीराम राम रणकर्कश राम राम । श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥ हे रघुनन्दन श्रीराम ! हे भरतके अग्रज भगवान् राम! हे रणधीर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ! आप मुझे शरण दीजिए | श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥ मैं एकाग्र मनसे श्रीरामचंद्रजीके चरणोंका स्मरण और वाणीसे गुणगान करता हूं, वाणी द्धारा और पूरी श्रद्धाके साथ भगवान् रामचन्द्रके चरणोंको प्रणाम करता हुआ मैं उनके चरणोंकी शरण लेता हूँ | माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: । स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: । सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु । नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥ श्रीराम मेरे माता, मेरे पिता , मेरे स्वामी और मेरे सखा हैं | इस प्रकार दयालु श्रीराम मेरे सर्वस्व हैं, उनके सिवामें किसी दुसरेको नहीं जानता | दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा । पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥ जिनके दाईं और लक्ष्मणजी, बाईं और जानकीजी और सामने हनुमान ही विराजमान हैं, मैं उन्ही रघुनाथजीकी वंदना करता हूं | लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ । कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥ मैं सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर तथा रणक्रीडामें धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणाकी मूर्ति और करुणाके भण्डार रुपी श्रीरामकी शरण में हूँ | मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥ जिनकी गति मनके समान और वेग वायुके समान (अत्यंत तेज) है, जो परम जितेन्द्रिय एवं बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं, मैं उन पवन-नंदन वानारग्रगण्य श्रीराम दूतकी शरण लेता हूं | कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ । आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥ मैं कवितामयी डालीपर बैठकर, मधुर अक्षरोंवाले ‘राम-राम’ के मधुर नामको कूजते हुए वाल्मीकि रुपी कोयलकी वंदना करता हूं | आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्‌ । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥३५॥ मैं इस संसारके प्रिय एवं सुन्दर , उन भगवान् रामको बार-बार नमन करता हूं, जो सभी आपदाओंको दूर करनेवाले तथा सुख-सम्पति प्रदान करनेवाले हैं | भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्‌ । तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥ ‘राम-राम’ का जप करनेसे मनुष्यके सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं | वह समस्त सुख-सम्पति तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता हैं | राम-रामकी गर्जनासे यमदूत सदा भयभीत रहते हैं | रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे । रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: । रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम्‌ । रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥ राजाओंमें श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजयको प्राप्त करते हैं | मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामका भजन करता हूं | सम्पूर्ण राक्षस सेनाका नाश करनेवाले श्रीरामको मैं नमस्कार करता हूं | श्रीरामके समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं | मैं उन शरणागत वत्सलका दास हूँ | मैं सद्सिव श्रीराममें ही लीन रहूं | हे श्रीराम! आप मेरा (इस संसार सागर से) उद्धार करें | राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥ (शिव पार्वती से बोले –) हे सुमुखी ! राम- नाम ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ के समान हैं | मैं सदा रामका स्तवन करता हूं और राम-नाममें ही रमण करता हूं | इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥ इस प्रकार बुधकौशिकद्वारा रचित श्रीराम रक्षा स्तोत्र सम्पूर्ण होता है | ॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥



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हमारी संस्कृति

📜अपनी भारत की संस्कृति
को पहचाने.
ज्यादा से ज्यादा
लोगो तक पहुचाये. खासकर अपने बच्चो को बताए क्योकि ये बात उन्हें कोई नहीं बताएगा... और सच बोलू तो ये बाते हमे भी थोड़ी बहुत ही पता हे और हमारे साथ ही ये सब बाते ख़तम होती चली जाएगी....
इसको आगे जरुर भेजे और अगर आप के पास भी कोई जानकारी हे तो उसे भी इसमें जोड़ दे। अपनी आने वाली पीडी को इतना तो हम दे ही सकते हे....

📜🇮🇳🍶📝🙏📝🍶🇮🇳📜

📜😇( ०१ )    दो पक्ष-

कृष्ण पक्ष ,
शुक्ल पक्ष !

📜😇( ०२ )    तीन ऋण -

देव ऋण ,
पितृ ऋण ,
ऋषि ऋण !

📜😇( ०३ )    चार युग -

सतयुग ,
त्रेतायुग ,
द्वापरयुग ,
कलियुग !

📜😇( ०४ )    चार धाम -

द्वारिका ,
बद्रीनाथ ,
जगन्नाथ पुरी ,
रामेश्वरम धाम !

📜😇( ०५ )   चारपीठ -

शारदा पीठ ( द्वारिका )
ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम )
गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) ,
शृंगेरीपीठ !

📜😇( ०६ )   चार वेद-

ऋग्वेद ,
अथर्वेद ,
यजुर्वेद ,
सामवेद !

📜😇( ०७ )   चार आश्रम -

ब्रह्मचर्य ,
गृहस्थ ,
वानप्रस्थ ,
संन्यास !

📜😇( ०८ )   चार अंतःकरण -

मन ,
बुद्धि ,
चित्त ,
अहंकार !

📜😇( ०९ )   पञ्च गव्य -

गाय का घी ,
दूध ,
दही ,
गोमूत्र ,
गोबर !

📜😇( १० )   पञ्च देव -

गणेश ,
विष्णु ,
शिव ,
देवी ,
सूर्य !

📜😇( ११ )   पंच तत्त्व -

पृथ्वी ,
जल ,
अग्नि ,
वायु ,
आकाश !

📜😇( १२ )   छह दर्शन -

वैशेषिक ,
न्याय ,
सांख्य ,
योग ,
पूर्व मिसांसा ,
दक्षिण मिसांसा !

📜😇( १३ )   सप्त ऋषि -

विश्वामित्र ,
जमदाग्नि ,
भरद्वाज ,
गौतम ,
अत्री ,
वशिष्ठ और कश्यप!

📜😇( १४ )   सप्त पुरी -

अयोध्या पुरी ,
मथुरा पुरी ,
माया पुरी ( हरिद्वार ) ,
काशी ,
कांची
( शिन कांची - विष्णु कांची ) ,
अवंतिका और
द्वारिका पुरी !

📜😇( १५ )   आठ योग -

यम ,
नियम ,
आसन ,
प्राणायाम ,
प्रत्याहार ,
धारणा ,
ध्यान एवं
समािध !

📜😇( १६ )   आठ लक्ष्मी -

आग्घ ,
विद्या ,
सौभाग्य ,
अमृत ,
काम ,
सत्य ,
भोग ,एवं
योग लक्ष्मी !

📜😇( १७ )   नव दुर्गा --

शैल पुत्री ,
ब्रह्मचारिणी ,
चंद्रघंटा ,
कुष्मांडा ,
स्कंदमाता ,
कात्यायिनी ,
कालरात्रि ,
महागौरी एवं
सिद्धिदात्री !

📜😇( १८ )   दस दिशाएं -

पूर्व ,
पश्चिम ,
उत्तर ,
दक्षिण ,
ईशान ,
नैऋत्य ,
वायव्य ,
अग्नि
आकाश एवं
पाताल !

📜😇( १९ )   मुख्य ११ अवतार -

मत्स्य ,
कच्छप ,
वराह ,
नरसिंह ,
वामन ,
परशुराम ,
श्री राम ,
कृष्ण ,
बलराम ,
बुद्ध ,
एवं कल्कि !

📜😇( २० )   बारह मास -

चैत्र ,
वैशाख ,
ज्येष्ठ ,
अषाढ ,
श्रावण ,
भाद्रपद ,
अश्विन ,
कार्तिक ,
मार्गशीर्ष ,
पौष ,
माघ ,
फागुन !

📜😇( २१ )   बारह राशी -

मेष ,
वृषभ ,
मिथुन ,
कर्क ,
सिंह ,
कन्या ,
तुला ,
वृश्चिक ,
धनु ,
मकर ,
कुंभ ,
कन्या !

📜😇( २२ )   बारह ज्योतिर्लिंग -

सोमनाथ ,
मल्लिकार्जुन ,
महाकाल ,
ओमकारेश्वर ,
बैजनाथ ,
रामेश्वरम ,
विश्वनाथ ,
त्र्यंबकेश्वर ,
केदारनाथ ,
घुष्नेश्वर ,
भीमाशंकर ,
नागेश्वर !

📜😇( २३ )   पंद्रह तिथियाँ -

प्रतिपदा ,
द्वितीय ,
तृतीय ,
चतुर्थी ,
पंचमी ,
षष्ठी ,
सप्तमी ,
अष्टमी ,
नवमी ,
दशमी ,
एकादशी ,
द्वादशी ,
त्रयोदशी ,
चतुर्दशी ,
पूर्णिमा ,
अमावास्या !

📜😇( २४ )   स्मृतियां -

मनु ,
विष्णु ,
अत्री ,
हारीत ,
याज्ञवल्क्य ,
उशना ,
अंगीरा ,
यम ,
आपस्तम्ब ,
सर्वत ,
कात्यायन ,
ब्रहस्पति ,
पराशर ,
व्यास ,
शांख्य ,
लिखित ,
दक्ष ,
शातातप ,
वशिष्ठ !

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                       💐 🙏💐



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मेरे द्वारा की गयी भविष्यवाणी

आईये अंक ज्योतिष सीखे और जाने
इंद्रप्रस्थ के बदलते भाग्य का परिणाम अंक ज्योतिष के अनुसार  जानिए आचार्य पंडित भवानी शंकर वैदिक के साथ

आइए जानते हे चुनाव के दिन की अंकगणित क्या कहती हे चुनावी उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल v/s किरण बेदी
आचार्य पंडित भवानी शंकर वेदिक कहते हे चुनाव की नियत तिथी (07/02/2015) जिस दिवस का अंक 8 हैं जिसका स्वामी शनि है।

आइए जानते हैं किस प्रकार आया  दिन का अंक और उसका स्वामी
दिनांक - 7/2/2015 =

7+2+2+0+1+5 =7+1=8 (शनि)
अत: अंक ज्योतिष के अनुसार हम पाते हे कि दिन के अंक जोकि 8 हे उसका स्वामी शनि है ।
अब जानते हैं केजरीवाल के मूलांक भाग्यांक और नामांक अंक ज्योतिष के अनुसार किस प्रकार आये आचार्य पंडित भवानीशंकर वैदिक के साथ
नामांक =
A=1
R=2
V=6
I=1
N=5
D=4
K=2
E=5
J=1
R=2
I=1
W=6
A=1
L=3 कुल योग 4 ( राहू)
अतः चुनावी दिनके अंक व उम्मीदवार के नामंक के अनुसार अंको के स्वामी राहू व शनि आपस में मित्र हैं ।
अब जानते हैं ; भाग्यांक

भाग्यांक  निकालने के लिए आचार्य पंडित भवानीशंकर वैदिक बताते हैं की अंक ज्योतिष के अनुसार व्यक्ति की जन्मतिथि महीना  और वर्ष सम्मिलित किये जाते हैं
भाग्यांक का विश्लेषण

अरविन्द केजरीवाल की जन्म दिनांक 16/08/1968

1+6+0+8+1+9+6+8=39=9+3=12=1+2=3
अतः अंक ज्योतिष के अनुसार उम्मीदवार का भाग्यांक 3 हुआ जिसका स्वामी गुरु हैं चुकी चुनाव के दिन का स्वामी शनि हैं तथा भाग्यांक का स्वामी गुरु  हैं अतः गुरु व शनि दोनों सम हैं जो की उम्मीदवार को सम फल देने वाले हैं

अब जानते हैं मूलांक
आचार्य पंडित भवानी शंकर बताते हैं की व्यक्ति का मूलांक
जानने के लिए व्यक्ति का जन्म दिनांक  जानना जरुरी हैं
चुकी उम्मीदवार की जन्म तिथि 16 हैं अतः 1+6= 7
अतः उम्मीदवार का  मूलांक 7 हुआ जिसका स्वामी केतु होगा चूकि चुनावी दिवस का स्वामी शनी हैं अत: केतु और शनी आपस में मित्र हुए जोकि उम्मीदवार को शुभ फल देने वाले हैं।
अत: चुनावी दिवस के अंको के तालमेल के अनुसार यह निष्कर्ष निकलता हैं की चुनावी दिवस  के अंक सभी केजरीवाल के पक्ष में हैं।
अब जानते हैं किरण बेदी भाग्य क्या कहता हैं?
नामांक
K=2
I=1
R=2
A=1
N=5
B=2
E=5
D=4
I=1कुल योग =23=2+3=5
दिवस का अंक 8(शनी)
नामांक का स्वामी(बुध)
शनी+बुध=मित्र जो की शुभ फल देने वाले हैं।
KIRAN BEDI's dob
9/6/1949
9+6+1+9+4+9=38 > 11>1+1=2(भाग्यांक)
अत: किरण बेदी का भाग्यांक अंक ज्योतिष के अनुसार 2 हुआ जिसका स्वामी चन्द्र हैं चूंकि  चुनावी दिवस का स्वामी शनी हैं अत:+( चंद्र +शनी)=शत्रु।
इसलिए आचार्य पंडित भवानी शंकर वैदिक बताते हैं की चुनावी दिवस के अंक और उम्मीदवार के भाग्यांक के अनुसार अंको के स्वामी उम्मीदवार को अशुभ फल देने वाले हैं।
अब मूलांक बताते  हुए अंक ज्योतिष कहती हैं की उम्मीदवार की dob 9 हैं अत: मूलांक 9 ही हुआ
इसलिए दिवस का स्वामी शनी तथा मूलांक का स्वामी मंगल (मंगल+शनी)=शत्रु अत:मूलांक स्वामी और दिवस के अंक के स्वामी के अनुसार यह क्रम उम्मीदवार को अशुभ फल देने वाला हुआ ।
ये तो हुआ चुनावी दिवस का विश्लेषण
जोकि जीत की सुई केजरीवाल को अंकित करती हैं
आप जानते हैं कैसे बदला  भाग्य चुनावी परिणाम के दिन
क्या कहती हैं अंक ज्योतिष चुनावी परिणाम के बारे में ?
जानते हैं आचार्य पंडित भवानीशंकर वैदिक के साथ
चुनाव परिणाम का दिन 10/2/2015
परिणामी दिवस का विश्लेषण
अरविन्द केजरीवाल
ऊपर दी हुई विधि के अनुसार चुनावी दिवस का दिवसांक 2होगा जिसका स्वामी चन्द्र हैं
चुकी केजरीवाल का नामांक4हैं जिसका स्वामी राहू हैं यद्यपि परिणामी दिवश का दिवसांक 2 हैं तथा नामाक राहू व चन्द्र आपस में शत्रु हुए जो की उम्मीदवार को असुभ फल देने वाले हुए ।
भाग्यांक 3 हैं
जिसका स्वामी गुरु हैं और परिणामी दिवसांक 2 जिसका स्वामी चन्द्र हुआ [गुरु+चन्द्र]=सम
अत: भाग्यांक के अनुसार भी उम्मीदवार को शुभ फल मिलता नज़र नही आता हैं।
अब अगर मूलांक के अनुसार देखें तो केजरीवाल का मूलांक उनकी जन्म तिथि के अनुसार 16 हैं अत; 1+6=7 और स्वामी हुआ केतु +चन्द्र=शत्रु अत:परिणाम वाले दिन केजरीवाल का भाग्य विपरीत दिशा में दोड़ने लगा था ।
अब जानते हैं
किरण बेदी का चुनावी दिवस कैसा रहेगा?
जैसा की आप पढ़ चुके हैं की चुनावी दिवस का स्वामी चन्द्र हैं:और किरण बेदी का नामांक 5 था इसलिए {चन्द्र+बुध}=मित्र
अत:आचार्य जी कहते हैं की नामंक के अनुसार अंको के स्वामी उम्मीदवार को शुभ फल देने वाले हुए
तथा भाग्यांक के अनुसार जो की किरण बेदी का 2 हैं
और दिवसांक जो की 2 ही हैं इसलिए{चन्द्र+चन्द्र}=सम >जो कि अंको  के अनुसार उम्मीदवार को सम फल देने वाले हैं।
अब अगर किरण बेदी के मूलांक की बात करे तो पता चलता हैं की बेदी का मूलांक 9हुआ जिसका स्वामी मंगल हुआ अत:=मंगल+चन्द्र=मित्र
अत: अंक ज्योतिष के अनुसार परिणामी दिवस पर जीत की नोका बेदी की ओर जाती दिखाई दे रही हैं ।

आपने देखा की चुनावी दिवस के अंक ज्योतिष की सेफेरियल पद्धति के अनुसार सभी ग्रहोँ अरविंद केजरीवाल पर मेहरबान हे यदि इसी स्थिति कर्म को चुनावी परिणामोँ से आकलन किया जाए तो एक नया परिणाम उजागर होता हे जो कि चुनाव वाले दिवस की अपेक्षा विपरीत हे अंक ज्योतिष के साथ आपका शुभचिंतक पंडित भवानी शंकर वैदिक
जुड़े रहिये और बने रहिये
नमो नारायणाय
8952814450


वट सावित्री व्रत




प्रसंगवश : वट सावित्री पूजन

वट सावित्री व्रत सौभाग्य को देने वाला और संतान की प्राप्ति में सहायता देने वाला व्रत माना गया हैं यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक बन चुका है। इस व्रत की तिथि को लेकर भिन्न मत हैं। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है, वहीं निर्णयामृत आदि के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को व्रत करने की बात कही गई है।

 

तिथियों में भिन्नता होते हुए भी व्रत का उद्देश्य एक ही है : सौभाग्य की वृद्धि और पतिव्रत के संस्कारों को आत्मसात करना। कई व्रत विशेषज्ञ यह व्रत ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिनों तक करने में भरोसा रखते हैं। इसी तरह शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से पूर्णिमा तक भी यह व्रत किया जाता है। विष्णु उपासक इस व्रत को पूर्णिमा को करना ज्यादा हितकर मानते हैं।
 

वट सावित्री व्रत में 'वट' और 'सावित्री' दोनों का विशिष्ट महत्व माना गया है। पीपल की तरह वट या बरगद के पेड़ का भी विशेष महत्व है। पाराशर मुनि के अनुसार- 'वट मूले तोपवासा' ऐसा कहा गया है। पुराणों में यह स्पष्ट किया गया है कि वट में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से मनोकामना पूरी होती है। वट वृक्ष अपनी विशालता के लिए भी प्रसिद्ध है।

 

संभव है वनगमन में ज्येष्ठ मास की तपती धूप से रक्षा के लिए भी वट के नीचे पूजा की जाती रही हो और बाद में यह धार्मिक परंपरा के रूप में विकसित हो गई हो। दार्शनिक दृष्टि से देखें तो वट वृक्ष दीर्घायु व अमरत्व-बोध के प्रतीक के नाते भी स्वीकार किया जाता है। वट वृक्ष ज्ञान व निर्वाण का भी प्रतीक है। भगवान बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसलिए वट वृक्ष को पति की दीर्घायु के लिए पूजना इस व्रत का अंग बना। महिलाएं व्रत-पूजन कर कथा कर्म के साथ-साथ वट वृक्ष के आसपास सूत के धागे परिक्रमा के दौरान लपेटती हैं।

 

वट वृक्ष का पूजन और सावित्री-सत्यवान की कथा का स्मरण करने के विधान के कारण ही यह व्रत वट सावित्री के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सावित्री भारतीय संस्कृति में ऐतिहासिक चरित्र माना जाता है। सावित्री का अर्थ वेद माता गायत्री और सरस्वती भी होता है। सावित्री का जन्म भी विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था। कहते हैं कि भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियां दीं। अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। इसके बाद सावित्रीदेवी ने प्रकट होकर वर दिया कि 'राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी।'

 

सावित्रीदेवी की कृपा से जन्म लेने की वजह से कन्या का नाम सावित्री रखा गया। कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान थी। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा। सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहां साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया। कहते हैं कि साल्व देश पूर्वी राजस्थान या अलवर अंचल के इर्द-गिर्द था। 

 

सत्यवान अल्पायु थे। वे वेद ज्ञाता थे। नारद मुनि ने सावित्री से मिलकर सत्यवान से विवाह न करने की सलाह दी थी परंतु सावित्री ने सत्यवान से ही विवाह रचाया। पति की मृत्यु की तिथि में जब कुछ ही दिन शेष रह गए तब सावित्री ने घोर तपस्या की थी, जिसका फल उन्हें बाद में मिला था।

 

सौभाग्य के लिए किया जाने वाले वट-सावित्री व्रत आदर्श नारीत्व के प्रतीक के नाते स्वीकार किया गया है। पुराण, व्रत व साहित्य में सावित्री की अविस्मरणीय साधना की गई है। 

 
नमो नारायणाय


रविवार, 18 अगस्त 2013

सूर्य आदित्यहृदयस्तोत्रम्

सूर्य आदित्यहृदयस्तोत्रम्

सूर्य आदित्यहृदयस्तोत्रम्

सूर्य संबंधी समस्ता बाधाओं को दूर करने के लिए प्रतिदिन प्रात:काल आदित्यहृदयस्तोत्र का पाठ करना बहुत ही अनुकूल लाभदायक रहता है और कठिन से कठिन समस्याओं का निवारण हो जाता है।

॥ पूर्व पीठिका ॥

ततो युध्दपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।

रावणं चाऽग्रतो दश्ष्टवा युध्दाय समुपस्थितम् ॥1॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।

उपगम्याऽब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥

तब युध्द में चिन्ताकुल युध्द से थके हुए और युध्द के लिए सामने उपस्थित रावण को देखकर देवताओं से प्रेरित युध्द को देखने के लिए समीप आकर महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम से कहा-॥1-2॥

राम! राम! महाबाहो! श्शणु गुह्यं सनातनम् ।

येन सर्वानरीन् वत्स! समरे विजयिष्यसे ॥3॥

हे राम! हे विशालबाहो! जिससे युध्द में सब शत्रुओं को जीता जा सकेगा, हे वत्स! उस गोप्य सनातन (स्तोत्र) को सुनो॥3॥

आदित्य   हृदयं   पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।

जयावहं जपेन्नित्यं अक्षयं परमं शिवम् ॥4॥

आदित्य हृदय स्तोत्र शत्रुविनाशक, पुण्य, अक्षय, परं शिव और जय देने वाला है, उसे नित्य जपना चाहिए॥4॥

सर्वमगल - मागल्यं   सर्वपापप्रणाशनम् ।

चिंता - शोक - प्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तामम् ॥5॥

सर्वमंगलमांगल्यों का करने वाला, सब पापों का शमन करने वाला, चिन्ता शोक हरने वाला और आयु धन बढ़ाने वाला है॥5॥

विनियोग : - ॐ अस्य श्रीआदित्य हृदय स्तोत्रस्यागस्त्य गषि:, अनुष्टुप् छन्द:, आदित्यहृदय भूतो भगवान ब्रह्मा देवता, निरस्ताशेषविघ्तया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वशत्रुक्षयार्थ पूर्वकं सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोग:।

ऋष्यादिन्यास :- अगस्त्य गषये नम: शिरसि। अनुष्टुप् छन्दसे नम: मुखे। आदित्य हृदयभूत ब्रह्मदेवतायै नम: हृदि। ॐ बीजाय नम: गुह्ये। रश्मिमते शक्तये नम: पादयो:। ॐ तत्सवितुरित्यादि गायत्री कीलकाय नम: नाभौ। विनियोगाय नम: सर्वागे।

करन्यास :- इस स्तोत्र के करन्यासादि तीन तरह से हो सकते हैं। केवल प्रणव से, गायत्री मंत्र से अथवा रशिममते इत्यादि छ: नाम मंत्रें से।

ॐ रश्मिते          अंगुष्ठाभ्यां नम:    हृदयाय नम:।

ॐ समुद्यते          तर्जनीभ्यां नम:,   शिरसे स्वाहा।

ॐ देवासुरनमस्कृताय        मध्यमाभ्यां नम:, शिखायै वषट्।

ॐ विवस्वते        अनामिकाभ्यां नम:,          कवचाय हुम्।

ॐ भास्कराय       कनिष्ठिकाभ्यां नम:,          नेत्रत्रयाय वौषट्

ॐ भुवनेश्वराय     करतलकरपश्ष्ठाभ्यां नम:, अस्त्राय फट्।

ततपश्चात मां गायत्री का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र का 11 बार जाप करने के उपरांत इस स्तोत्र का पाठ करें।

स्तोत्र प्रारंभ

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवाऽसुर - नमस्कृतम्।

पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥1॥

रश्मियों वाले समुद्यत, सुर असुरों से नमस्कृत, विवस्वान् भुवन के स्वामी भास्कर को पूजना चाहिए॥1॥

सर्वदेवात्मको   ह्येष    तेजस्वीरश्मिभावन: ।

एष देव: सुरगणांगोकान् पातु गभस्तिभि: ॥2॥

ये देव सब देवों में लीन, तेजस्वी तथा रश्मिभावन हैं, ये देव सब सुरजनों को और लोकों को अपनी किरणों से रक्षा करें॥2॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: ।

महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यपांपाति ॥3॥

ये ही देव ब्रह्मा हैं, विष्णु हैं, शिव हैं, कार्तिकेय, प्रजापति, महेन्द्र हैं, कुबेर हैं, काल हैं, यम हैं, सोम और वरुण हैं॥3॥

पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: ।

वायुर्वह्नि: प्रजा-प्राणा गतुकर्ता प्रभाकर: ॥4॥

आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान् ।

सुवर्णस्तपनो भानु: स्वर्णरेता दिवाकर: ॥5॥

पितर, वसु, साधय, अश्विनीकुमार, मरुत, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण (प्राणायामादि) गतुकर्ता, प्रभाकर, आदित्य, सविता, सूर्य, खग, पूषा, गभस्तिमान्, सुवर्ण, तपन, भानु, स्वर्णरेता, दिवाकर उन्हीं देव के नाम हैं॥4-5॥

हरिदश्व:      सहस्रार्चि:     सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।

तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा र्मातण्डकोऽशुभान् ॥6॥

हिरण्यर्भ:    शिशिररस्तपनो     भास्करो   रवि: ।

अग्निगर्भोऽदिते: पुत्र: शङ्ख: शिशिर नाशन:॥7॥

हरिदश्व, सहस्रार्चि, सप्तसप्ति, मरीचिमान्, तिमिरोन्मथन, शम्भु, त्वष्टा, मार्तण्ड, अंशुमान्, हिरण्यगर्भ, शिशिरतापन, भास्कर, रवि, अग्निगर्भ, अदितिपुत्र, शंख और शिशिरनाशन वे ही हैं॥6-7॥

व्योमनाथस्तमोभेद       गग्यजु:       सामपारग:।

धनवश्ष्टिरपां   मित्रे   बिन्ध्यवीथीप्लवगम: ॥8॥

आतपी मंडली    मृत्यु:    पिगल:   सर्वतापन: ।

कविर्विश्वो    महातेजा रक्त:   सर्वभवोद्भव: ॥9॥

व्योमनाथ, तमोभेद, गक्, यजु, साम, धनवश्ष्टि, जलमित्र, विन्धयावीथी, प्लवंगम, आतपी, मंडली, मृत्यु, पिंगल, सर्वतापन, कवि, विश्व, महातेज, रक्त और सर्वभवोद्भव वे ही हैं॥8-9॥

नक्षत्र - ग्रह - ताराणामधिपो      विश्वभावन: ।

तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥10॥

नम:    पूर्वाय     गिरये   पश्चिमायाऽर्द्रये नम: ।

ज्योतिर्गणानां    पतये    दिनाधिपतये   नम: ॥11॥

नक्षत्र ग्रहों, तारों के अधीश वे ही हैं। विश्वभावन, तेजस्वियों में भी तेजस्वी, द्वादशसूर्यात्मन् आपको नमस्कार है। पूर्व गिरि में दश्श्यमान प्रात:कालीन आपको और पश्चिम में हिमाद्रि सायंकाल आपको नमस्कार है। ज्योति प्रकाशकों के स्वामी और दिन के स्वामी आपको नमस्कार है॥10-11॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: ।

नमोनम: सहस्रांक्षो आदित्याय नमो नम: ॥12॥

नम उग्राय विराय सारगाय नमो नम: ।

नम: पद्मप्रबोधायप्रचंडाय नमोऽस्तु ते ॥13॥

जय और जयभद्र, अर्यश्व, सहस्राक्ष और आदित्य आपको नमस्कार है। उग्र, वीर, सारंग, कमलप्रबोध और प्रचंड आपको नमस्कार है॥12-13॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूरायादित्यवर्चसे ।

भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥14॥

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायाऽमितात्मने ।

कश्घ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥15॥

ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर, आदित्यवर्चस, भास्वत, सर्वभक्ष रौद्र रूप आपको नमस्कार है। तम का नाश करने वाले, हिम को पिघलाने वाले, शत्रु नाशकर्ता, अमितस्वरूप, कृतघ्नों को हनन करने वाले और ज्योतियों (प्रकाशों) के पति उन देव को नमस्कार है॥14-15॥

तप्तचामीकराभाय, हरये विश्वकर्मणे ।

नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥16॥

नाशयत्येष वै भूतं तमेव सश्जति प्रभु: ।

पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥17॥

तापकराभा वाले, हरि, विश्वकर्मा, रुचि, लोकसाक्षी नामों वाले तम विनाशक आपको नमस्कार है। ये ही देव भूतों को नष्ट करते और सश्जन करते हैं, ये ही रक्षा करते और तपाते हैं और किरणों से ही वर्षा करते हैं॥16-17॥

एष   सुप्तेषु    जागर्ति     भूतेषु    परिनिष्ठित:

एष चैवाऽग्निहोत्रं च फलं चैवाऽग्निहोत्रिणाम् ॥18॥

देवाश्च  तवश्चैव      तूनां   फलमेव च ।

यानि कश्त्यानि लोकेषु सर्वेषु परम प्रभु: ॥19॥

यही देव प्राणियों में प्रतिष्ठित होकर उन्हें जगाते हैं, और ये ही यज्ञकर्ताओं के यज्ञफल को जन्मते हैं। देवता, कर्मकर्ता और उनका फल सबमें जो भी कश्त्य हैं, सबमें परम प्रभु हैं॥18-19॥

एनमापत्सु कश्च्छे्रषु कान्तारेषु भयेषु च ।

कीर्तयन् पुरुष: कश्चिनवसीदति राघव ॥20॥

हे राम! आपत्तियों, कार्यों, कान्तारों और सब भयों में इन्हीं का कीर्तन करते हुए मनुष्य दुखी नहीं होता है॥20॥

पूजयस्वैनमेकाग्रो        देवदेवं     जगत्पतिम् ।

एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युध्देषु विजयिष्यसि ॥21॥

इस देवाधिदेव जगत्पति को एकाग्र होकर पूजो, इसे तिगुना जप करके युध्दों में जय प्राप्त करोगे॥21॥

अस्मिन् क्षणे महाबाहो!   रावणं त्वं जहिष्यसि ।

एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥22॥

एतच्श्रुत्वा     महातेजा      नष्टशोकोऽभवत्तादा ।

धारयामास सुप्रीतो राघव:   प्रयतात्मवान् ॥23॥

हे महाबाहो! उस क्षण तुम रावण को जीतोगे, ऐसा कहकर अगस्त्य गषि जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। यह सुनकर महातेजस्वी, आत्मस्थ श्रीराम ने प्रसन्न और शोक रहित होकर उसे वैसे ही धारण किया॥22-23॥

स्तोत्र यहीं तक है परन्तु कुछ विद्वानों और मनीषियों ने कुछ और पढ़ते हैं जो इस प्रकार हैं

आदित्यं   प्रेक्ष्य   जपत्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् ।

त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥1॥

रावणं प्रेस्य हृष्टात्मा युध्दार्थं समुपागमत् ।

सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धश्तोऽभवत् ॥2॥

तब आदित्य का जप करके यह परम हर्ष उन्होंने प्राप्त किया। और तीन बार आचमन कर पवित्र होकर धनुष लेकर वे वीर्यवान प्रसन्न होकर युध्द हेतु रावण के पास पहुंचे। उसके वधा में सब प्रकार से उन्होंने प्रयत्न किया॥1-2॥

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।

निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥3॥

तब सूर्य ने श्रीराम को देखकर मुदितमन होकर अत्यन्त तुष्ट होकर राक्षसराज रावण का क्षय जानकर देवों के मधय (आकाश) में स्थित होकर वाणी से स्तवन किया॥3॥

इति वाल्मीकीय रामायणे रामरावण युद्ध परिश्राान्ते अगस्त्य ऋषि कृत आदित्य स्तोत्रं समाप्तम्

नमो नारायणाय